1. यूक्रेन-रूस संघर्ष: स्थिति और उथल-पुथल
यूक्रेन और रूस के बीच संघर्ष अभी भी गंभीर रूप से जारी है। रूस की सेना ने डोनेट्स्क और लुहान्स्क के पूर्वी यूक्रेन क्षेत्रों में अपनी आक्रामकता बढ़ा दी है, जबकि यूक्रेन की सेना ने अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए पश्चिमी सहायता को अधिक प्राथमिकता दी है। यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की ने हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से और अधिक सैन्य और आर्थिक सहायता की मांग की है।
इस बीच, रूस ने यूक्रेन पर नए हवाई हमले तेज कर दिए हैं, और रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूस ने कई बार यूक्रेनी शहरों में नागरिक इलाकों को निशाना बनाया है, जिसमें कई लोगों की जानें गई हैं। संयुक्त राष्ट्र ने इस हिंसा को “मानवाधिकारों का उल्लंघन” बताते हुए शांति की अपील की है, लेकिन युद्ध रुकने का नाम नहीं ले रहा।
विश्लेषण: इस संघर्ष ने यूरोप में सुरक्षा परिप्रेक्ष्य को बदल दिया है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और कच्चे माल की कीमतों में भी भारी उथल-पुथल देखने को मिली है। विश्वभर में शरणार्थियों की संख्या बढ़ी है और यूरोप में देश अपनी सीमाओं की सुरक्षा को लेकर अधिक सख्त हो गए हैं।
2. इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष: गाजा में बढ़ती हिंसा
इजराइल और फिलिस्तीन के बीच गाजा पट्टी में संघर्ष में हालिया उभार आया है। इजराइल ने गाजा पर भारी हवाई हमले किए हैं, जिसके परिणामस्वरूप दर्जनों फिलिस्तीनी नागरिकों की मौत हो गई है। गाजा पट्टी में विभिन्न आतंकी समूहों द्वारा इजराइली नागरिक क्षेत्रों में रॉकेट हमले भी किए गए हैं। फिलिस्तीनी समूह हमा्स और इजराइल के बीच यह संघर्ष लंबे समय से चल रहा है, और अब यह संघर्ष एक नए चरण में पहुंच चुका है।
अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने इस संघर्ष को “अनावश्यक हिंसा” करार दिया है और शांति बहाली के लिए आग्रह किया है। संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ ने इस मुद्दे पर चिंता जताई है और जल्द शांति वार्ता की आवश्यकता बताई है।
विश्लेषण: यह संघर्ष सिर्फ इजराइल और फिलिस्तीन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र में अस्थिरता का कारण बन रहा है। इसके कारण, कई देशों में राजनीतिक असहमति और अस्थिरता पैदा हो रही है। इसके अलावा, अरब देशों का इजराइल के प्रति रुख भी धीरे-धीरे बदल रहा है, जिससे क्षेत्रीय राजनीति पर असर पड़ सकता है।
3. जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट
संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पर ताजे रिपोर्ट के अनुसार, पृथ्वी का औसत तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर बढ़ने की दिशा में है, जो वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि हम तत्काल प्रभाव से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को रोकने के उपाय नहीं करते, तो आने वाले दशकों में समुद्र स्तर में वृद्धि, कृषि उत्पादन में गिरावट और प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती संख्या का सामना करना पड़ सकता है।
संयुक्त राष्ट्र ने देशों से अनुरोध किया है कि वे जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कड़े कदम उठाएं, और 2030 तक उत्सर्जन में 45% की कमी लाने का लक्ष्य निर्धारित करें। वर्तमान में केवल कुछ देशों ने इस दिशा में प्रभावी कदम उठाए हैं, जबकि अन्य देशों में आर्थिक दबाव के कारण तेजी से बदलाव लाना मुश्किल हो रहा है।
विश्लेषण: जलवायु परिवर्तन एक ऐसा वैश्विक संकट बन चुका है, जिसका सामना हर देश को करना पड़ रहा है। विकासशील देशों में इसका प्रभाव अधिक दिख रहा है, जहां प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो रहा है। यह समस्या वैश्विक असमानता को और भी बढ़ा रही है।
4. ब्रिटेन में आर्थिक संकट: महंगाई और बेरोजगारी में वृद्धि
ब्रिटेन में आर्थिक संकट गहरा गया है, जहां महंगाई दर ऐतिहासिक उच्चतम स्तर पर पहुँच चुकी है। खाद्य पदार्थों, ऊर्जा, और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में भारी वृद्धि हो रही है, जिससे आम नागरिकों को भारी मुश्किलें हो रही हैं। इसके अलावा, बेरोजगारी दर में भी वृद्धि देखने को मिल रही है, और सरकार ने आर्थिक स्थिति को संभालने के लिए नए उपायों की घोषणा की है।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने आर्थिक संकट से निपटने के लिए सामाजिक सहायता योजनाओं का विस्तार करने का वादा किया है, लेकिन आलोचक इसे पर्याप्त नहीं मानते। कई ब्रिटिश नागरिकों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं, और सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है।
विश्लेषण: ब्रिटेन के लिए यह संकट केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक भी है। यदि यह संकट और बढ़ता है, तो इसका असर पूरे यूरोपीय संघ पर पड़ेगा। हालांकि, सरकार ने राहत योजनाएं लागू की हैं, लेकिन यह देखना होगा कि वे किस हद तक प्रभावी साबित होती हैं।
5. भारत-चीन सीमा विवाद: बढ़ता तनाव
भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव एक बार फिर से बढ़ गया है। पिछले कुछ हफ्तों में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हल्की झड़पों की खबरें आई हैं। हालांकि, दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों के बीच बैठक हुई थी, लेकिन इस बैठक से भी कोई ठोस समाधान नहीं निकला।
विशेषज्ञों के अनुसार, चीन द्वारा सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य निर्माण और रणनीतिक स्थितियों में बदलाव से तनाव बढ़ा है। दोनों देशों के नेताओं ने कूटनीतिक समाधान की बात की है, लेकिन वास्तविक स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है।
विश्लेषण: इस विवाद का वैश्विक राजनीति पर गहरा असर पड़ सकता है। भारत और चीन दोनों ही एशिया के प्रमुख ताकतवर देश हैं और यदि यह तनाव बढ़ता है तो एशिया की सुरक्षा और आर्थिक विकास पर असर पड़ेगा।